सावन का महीना गगन करे बोर।
मेघ को छितराए जैसे ले जाये चोर।।
धरती अकुलाई है धान मुरझाया है।
खाते में नहीं कोई अनुदान आया है।।
किसानों की आँखों से झड़ते हैं नोर...
मेघ को छितराए जैसे ले जाये चोर।।
सावन का महीना गगन करे बोर।
मेघ को छितराए जैसे ले जाये चोर।।....
कभी बहे पछवा कभी बहे पूरबैया।
सुखी नदी में नाव खेबै है खेबैया।।
कादो के बदले हलवाहा करै सुखजोत...
मेघ को छितराए जैसे ले जाये चोर।।
सावन का महीना गगन करे बोर।
मेघ को छितराए जैसे ले जाये चोर।।
परमात्मा करे क्या जाने सबको इशारा।
आत्मा को मिलता नहीं है कोई किनारा।।
मर्जी पर उसकी चलता नहीं किसी का जोर...
मेघ को छितराए जैसे ले जाये चोर।।
सावन का महीना गगन करे बोर।
मेघ को छितराए जैसे ले जाये चोर।।