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बस्ता उम्मीदों का

Gauri Kathait

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घर से जो उम्मीदों का बस्ता लिए निकले हैं
        
                                                    
                            
इस अनजान सफर पर जो
तो धीरे-धीरे समय के साथ-साथ
कांधो पर वजन लगातार बढने सा लगा है
शरीर की दृढ़ता और मन की स्थिरता
अब वो पहले जैसे स्तर पर नहीं रही
शरीर मांगता है, थक कर दो पल आराम के
मन मांगता है कुछ समय घोर सुकुन के
मगर फिर, कांधो को उचकाते हुए
उस बस्ते के बढ़ते वजन को महसूस करता हूँ
वो बस्ता उम्मीदों का,
जिसे मे घर से लेकर आया था
अब वही बस्ता,
लौटकर मुझे घर नहीं जाने देता अधूरी उम्मीदों के साथ ....
2 वर्ष पहले
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