मनुष्यों को आखिर घमंड किस बात का है|
ये मैं आज तक नहीं समझी,
अरे! तुझपे दुनिया नहीं तू दुनिया पर निर्भर है,
तू खुद को परख तू खुद महसूस करेगा,
तू ही अंदर से खांखर है|
तू क्या बनेगा आत्म निर्भर
जब तू एक एक सांस का मोहताज है|
छोड़ दे ये ढ़ंग,
वरना अपने साथ साथ कर देगा तू इस दुनिया को भी बेढंग|