मैंने कभी पिता जी को बूढ़ा होते हुए देखा ही नहीं,
उनके नयनों में बस मेरे नौकरी पाने की प्रतीक्षा देखी।
माँ के जाने के बाद, ना टूटे वो, ना बिखरे,
उनके कंधों पर पूरे घर की जिम्मेदारी देखी।
जिस दिन लगी नौकरी, वो रात भर सोये नहीं,
आँखों में खुशी के आँसू, होठों पर मुस्कान देखी।
मेरा रोल नंबर उन्होंने बीसों बार देखा,
हर बार जैसे अपनी ही जीत का प्रमाण देखा।
फिर मेरे बच्चों को गोद में खिलाते देखा,
उनकी आँखों में फिर से अपना बचपन देखा।
मैंने कभी पिता जी को थकते हुए देखा ही नहीं,
अपने दुःख छुपाकर, मुझे हँसते हुए देखा ही है।
पिता जो बूढ़े नहीं होते, वो बस जिम्मेदारियों में ढल जाते हैं,
अपने सपनों को मारकर, बच्चों के सपने पल जाते हैं।
-गौरव कुमार तिवारी