*ए मनवा तू भटक मत, _ भोजपुरी कविता
ए मनवा तू भटक मत, डगरिया कठिन बा,
तोहरे पग में आजु, घर भर के आस टिकल बा।
बाबूजी के पसीना देख, कइसे रात-दिन खटेले,
तोहरा पढ़ाई खातिर, आपन सुखवा बेचले।
उनकर फटल बेवाई, तोहार किताब बनल बा,
ए मनवा तू भटक मत, बाबूजी के सपना पूरा करेके बा।
माई उर्मिला के अँचरवा, अबहियों भीजल बा,
चूल्हा पर रोटी संग, तोहार नाम रटल बा।
उनकी करेजा में आगि बा, आँख में तोहरा खातिर लोर बा,
जग हँसी त का होई, उनकर सारा दुलार तोहरे ओर बा।
माई के चुप्पी में भी, एगो अरज सुनात बा,
ए मनवा तू भटक मत, माई उर्मिला के लाज रखेके बा।
दोस्त-यार के मस्ती में, मत समयइया गंवाव,
दुनिया के चकाचौंध में, मत सपना बहाव ।
तोहार एगो जीत से, दुआर रोशन हो जाई,
बाबूजी के झुकल कंधा, फेर से जवान हो जाई।
माई के भगिया के, मान तू बढ़इह,
ए मनवा तू भटक मत, आपन नाम बनइह।
उठ जा.. कलम उठा ल , अबो समयइया बा,
तोहरे मेहनत से, इ भगिया बदलत बा।
बाबूजी के सपना, माई के लाज,
तोहरे हाथ में बा, ए मनवा तू भटक मत बाबूजी के सपना पूरा करेके बा।।
- गौरव कुमार तिवारी