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वक्त का खेल लेखक गौरव पाल छत्रपति

Gaurav Chhatrapati

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वक्त के आगे चला नहीं ।
        
                                                    
                            
ना ही वक्त बदल पाएगा ।।
सब का एक समय है निश्चित ।
जो आया है वह जाएगा ।।
इस मायावी दुनिया में रहकर ।
माया ही खेल रचाया है ।।
सब मोह माया के चक्कर में ।
अपनों से ही दूर हुए ।।
इस मायावी दुनिया में अक्सर ।
अपनों ने ही नीच बताया है ।।
ये धर्म की बातें समझ ना पाते ।
मोहिनी अपना रूप दिखाया है ।।
सब मोह के चक्कर में आकर ।
मोहिनी को अपना सब कुछ बताया है ।।
जननी भी ये भूल जा रहे ।
मोहनी प्रचंड फैलाया है ।।
एक दिन ऐसा आएगा ।
जनानी को भी इच्छा समझकर ।।
यह स्वयं ही उसको खाएंगे ।
फिर अत्याचार के बढ़ते बढ़ते।।
भगवान धरा पर आएंगे।
फिर रूप लेंगे विकराल।।
धारा से पाप हटाएंगे।
गौरव पाल की रुकी कलम अब।।
शारदा के दर जाएं हैं।
एक महीने पहले
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