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उनके शहर में मेरे जैसे और भी है,

G. Pritam Giri

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उनके शहर में मेरे जैसे और भी है,
        
                                                    
                            
मेरी पूरी कायनात में उसके जैसा कोई नहीं।
ये सच है मालूम मुझको,
वो इबादत किसी और के हैं,
हजारों मुद्दतें हैं, शिकायतें हैं,
मगर इश्क़ भी है,
तुम अपने नहीं हो, इसका रमज़ भी है
अब तो ख़्वाबों में भी आते है तुम्हारे चाहने वाले,
क्या करे मुझे अमीरों से रश्क़ भी है,
कैसे न जुड़ते जनाजे में काफिले,
इश्क़ करना भी तो फ़ौत ही है,
दिल ए दहलीज़ से गुजरते है काफिले मगर,
जो रुके पड़े हैं अभी भी दहलीज़ पर,
ये उन दो लफ़्ज़ों की ही दुनिया बनाते रहते हैं,
हर रोज कुछ ख़्वाब आते रहते है,
लगा रहता है जिसमें पाने और खोने का सिलसिला,
होने दो जो होते रहते हैं।
कहते रहते हैं।
4 घंटे पहले
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