" टप-टप बनी मुसीबत मेरी "
जितना शेर से नहीं डरता मैं,
उतना टपके से डर जाऊँ।
बारिश जब छत पर बरसे,
सोचूँ कहाँ मैं छिप जाऊँ।
टप-टप करती बूँदें आती,
फर्श पूरा गीला कर जाती।
बाल्टी रखूँ, बर्तन रखूँ,
फिर भी बूँद रुकने नही पाती।
शेर अगर जंगल से आए,
मैं उससे भी लड़ जाऊँ।
पर घर की छत टपकने लगे,
किससे जाकर उसे रुकवाऊँ?
इधर-उधर, इस कमरे में, उस कमरे में,
टपके ने हाहाकार मचाया।
बर्तन-भाड़े सब भर डाले,
फिर भी पानी रुक नहीं पाया।
कहीं किताबें भीग न जाएँ,
कहीं सामान न खराब हो जाए।
सोच-सोच मन घबराए,
टपका पल-पल मुझे सताए।
रात हुई तो नींद न आए,
टप-टप शोर सुनाए।
आँख लगे तब बूँद गिरे,
फिर से टपका मुझे जगाए।
टपका बनी मुसीबत मेरी,
अब छत की मरम्मत करवाऊँगा।
बारिश चाहे जितनी बरसे,
टपके को रुकवाऊँगा।
— प्रदीप बाबू