इंतज़ार की घड़ियों में
मैंने गुलाबी गुलाबी
ठंड के
सर्द चांद को
निहायत सलीके औ हिफाज़त से
उतारकर लिफाफे में
रख दिया।
और गोंद ऐसे लगाई कि
चांद महफूज़ भी रहे
और सांस भी ले पाए
छोटे अवकाश में से।
भेज दूंगी उसके पास
जो ठंड के
गुलाबी बन जाने की वजह
बन चुका है
जिसके साथ का ऐहसास
सर्द रातों
में उजरे चांद सा है ।
जिसकी पनाहों के अवकाश में
मेरा वजूद
आज़ाद भी है
महफूज़ भी ,
ठीक इस लिफाफे की तरह।
और
मुझे अब और इंतज़ार करना होगा
सुबह होने का
जब कि
पोस्ट ऑफिस खुलेगी ,
मगर ये जो
चांद है
वो तो आया है
रात को
मूल सिंधी कविता: सुनीता मोहिनानी
हिंदी अनुवाद: चारुमित्रा .रानडे