मेरी खिड़की के
उस पार
एक छोटा-सा
बारिश का भीगा
गीला कबूतर बैठा,
ठंड में काँपता,
थरथराता,
अपने पंखों को
झटककर
उन्हें सुखाने की
कोशिश करता
उसी कश्मकश में
मासूम असहाय
निगाहों से
मेरी ओर देखता हुआ
वह तो आज़ाद था,
और मैं खिड़की के इस पार,
निरीह असहाय
मानो क़ैद
अपने ही
कमरे में…....
वहीं एक ओर
पंकज उधास गा रहा था
“सोचो तो ये भी एक
क़फ़स ही तो है, जिसे
तहज़ीब की ज़बान में
कमरा कहा गया….!!!”