विज्ञापन

तुम्हें हॉस्टल छोड़ आया

Dr. Srk

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम्हें हॉस्टल छोड़ आया
        
                                                    
                            

तुम्हें छोड़ आया उस दिन, घर से दूर
इस शहर में नहीं जो, उस शहर में मिले
हमें जो उपलब्ध नहीं हुआ वह प्राप्त हो तुम्हें
हमारी मजबूरियां दोहरायी न जाय
तुम पढ़ लिख कर, सुदृढ़ रास्ता चुनो,
जो सपनों को साकार करे।
तुम जानो, भारी मन से दूर रख पाते हैं तुम्हें
अक्सर जब थाली रखते है, टेबल पर
तुम्हारी भी रख देते हैं।
इससे पहले कि, मां दूध का बिल चुकाती
तुम्हारी महीने की खर्च अलग कर देती
कम न हो गलती से, तकलीफ़ न हो
किसी भी कारणवश तुम हताश न हो।
कई बार बहस हो जाती है ह्म दोनों में
वह कहती है, बुला लो दो दिन की छुट्टी है
मै कहता, उसे पढ़ने दो, ध्यान भटक न जाए।
और जब वह हॉस्टल गिरने की खबर देखी
चिल्ला उठी थी मां तुम्हारी, पत्थर सी हों गई
काँप रहे थे हाथ फोन उठाते हुए
अचानक फोन बज भी उठा, छूट गई हाथों से
आवाज़ आई तुम्हारी, स्पीकर औन हो गया
तुमने कहा, मै ठीक हूं
काँपते हाथों से फोन उठाई मां ने,
फफक कर तो पड़ी।
फिर तुमने रोते हुए अपने दोस्त की बात कही
सिहर उठे थे हम
भय और सुकून की अजीब उधेड़बुन थी,
दिल्ली की फ्लाइट में बुत बन कर बैठे रहे
और उस मलबे के समीप
तुम्हारी हाथ थामे खड़े रहे हतप्रभ, सुन्न,
कहां गलती हुई, स्कूल में, या घर में?
या सपनों को साकार करने में?
13 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12711 कविताएं

View Profile

Pankaj Sharma

1271 कविताएं

View Profile