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जब मेरी अंतिम लौ जले

Dr. Shweta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब मेरी अंतिम लौ जले...
        
                                                    
                            
जब मेरी अंतिम यात्रा प्रारंभ हो,
तो भीड़ में केवल एक चेहरा
मैं तलाशुंगी
वह केवल तुम्हारा होगा।

चिता तक पहुँचने से पहले
एक बार मेरे पास आना,
इतने पास...
कि यदि मेरी बंद होती आँखों में
तुम्हारी छवि का कोई अंतिम कण
अब भी ठहरा हो,
तो वह भी
तुम्हारे साथ विदा ले सके।

कुछ मत कहना क्योंकि
मृत्यु के सामने
शब्द अक्सर
अपना अर्थ खो देते हैं।

बस एक बार
वैसे ही देखना मुझे
जैसे कभी
जीवन को देखा था मेरी आँखों में।

फिर जब अग्नि धीरे-धीरे
मेरे नाम, मेरे स्पर्श,
मेरी हँसी,
मेरे समस्त अस्तित्व को
अपने भीतर समेटने लगेगी
तब लोग
क्षण भर ठहरेंगे,
फिर लौट ही जाएँगे
अपनी-अपनी दुनिया में।

पर तुम...

तुम वहाँ बने रहना।

धुएँ के छँट जाने तक,
लपटों के थक जाने तक,
राख के शांत हो जाने तक।

क्योंकि कुछ प्रेम
वियोग में नहीं,
अग्नि में पूर्ण होते हैं।

और यदि कभी
उस अंतिम लौ में
तुम्हें मेरा होना दिखाई दे...
तो बस इतना याद रखना,
कि देह भले ही राख हो जाए,
सच्चा प्रेम
कभी समाप्त नहीं होता।
वह तो केवल
अपना रंग बदलता है।

-डॉ श्वेता बिष्ट
3 महीने पहले
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