आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जब मेरी अंतिम लौ जले

                
                                                         
                            जब मेरी अंतिम लौ जले...
                                                                 
                            
जब मेरी अंतिम यात्रा प्रारंभ हो,
तो भीड़ में केवल एक चेहरा
मैं तलाशुंगी
वह केवल तुम्हारा होगा।

चिता तक पहुँचने से पहले
एक बार मेरे पास आना,
इतने पास...
कि यदि मेरी बंद होती आँखों में
तुम्हारी छवि का कोई अंतिम कण
अब भी ठहरा हो,
तो वह भी
तुम्हारे साथ विदा ले सके।

कुछ मत कहना क्योंकि
मृत्यु के सामने
शब्द अक्सर
अपना अर्थ खो देते हैं।

बस एक बार
वैसे ही देखना मुझे
जैसे कभी
जीवन को देखा था मेरी आँखों में।

फिर जब अग्नि धीरे-धीरे
मेरे नाम, मेरे स्पर्श,
मेरी हँसी,
मेरे समस्त अस्तित्व को
अपने भीतर समेटने लगेगी
तब लोग
क्षण भर ठहरेंगे,
फिर लौट ही जाएँगे
अपनी-अपनी दुनिया में।

पर तुम...

तुम वहाँ बने रहना।

धुएँ के छँट जाने तक,
लपटों के थक जाने तक,
राख के शांत हो जाने तक।

क्योंकि कुछ प्रेम
वियोग में नहीं,
अग्नि में पूर्ण होते हैं।

और यदि कभी
उस अंतिम लौ में
तुम्हें मेरा होना दिखाई दे...
तो बस इतना याद रखना,
कि देह भले ही राख हो जाए,
सच्चा प्रेम
कभी समाप्त नहीं होता।
वह तो केवल
अपना रंग बदलता है।

-डॉ श्वेता बिष्ट
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर