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मैं अपना हिंदुस्तान लेता हूँ

Dr. Rashmi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़िंदगी इम्तिहान देता हूँ
        
                                                    
                            
एक रब का ही नाम लेता हूँ

माफ करना मेरी खताओं को
सारे क़िस्से तमाम करता हूँ

तेरे कितने सवाल हैं बाकी
मैं कहाँ अब सवाल करता हूँ

छोड़ दी फिक्र अब ज़माने की
मैं तो अपने हिसाब चलता हूँ

शौक़ जीने का तो मुझी को है
हर सबक अपने नाम करता हूँ

तेरे जलवों की मस्तियों के लिये
अब तो सब से मैं प्यार करता हूँ

अपने हिस्से की भी ईदी देकर
ईद का चाँद नज़र करता हूँ

कोई सुन ले न गुफ्तगू अपनी
ख़मोशियों में बात करता हूँ

अब तो ये हाल है मेरे मालिक
तुम को महसूस भी मैं करता हूँ

सारी दुनिया का नूर अपनी जगह
मैं अपना हिंदुस्तान लेता हूँ

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