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माँ को भी नज़रें लगतीं हैं

Dr. Rashmi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            माँ को भी नज़रें लगती हैं
        
                                                    
                            
कभी उसकी नज़र उतारा कर

हरदम अपना हिस्सा देती
कभी अपने कौर खिलाया कर

लोरी में सपने परियों के
तू अपनी नींद सुलाया कर

दुख में जो पलकें छलक़ीं
बच्चों सा उसे बहलाया कर

कुछ भी न माँगे खुद के लिए
उसके सजदे झुक जाया कर

खुशियाँ दे सदा दुलारे जो
उसको भी लाड़ लड़ाया कर

कैसी भी हो सुंदर लगती
काजल का टीका लगाया कर

इक पल न बैठे तेरे लिए
दुखते पाँव दबाया कर

जय-जय करना सिखलाया था
तू तीरथ-धाम कराया कर

कान्हा सा तुझे सजाती थी
उसकी बंसी बन जाया कर

गोदी उसके मेले घूमा
तू भी दुनिया दिखलाया कर

चलना सीखा था उँगली पकड़
उस की लाठी बन जाया कर

अक्षर, विद्या का ज्ञान दिया
गीता-रामायण सुनाया कर

माँ के हाथों का स्वाद न भूल
घी चुपड़ के रोटी खिलाया कर

वार दिया सब कुछ तुम पर
कर प्यार, गले लग जाया कर

जब थोड़ा वक़्त तेरा माँगे
दुनियादारी न समझाया कर

उस दूध का कुछ तो क़र्ज़ उतार
भवसागर पार कराया कर

दुनिया की दौलत कर कुर्बान
तू रूह की नेमत पाया कर

पीड़ा सह जिसने जना तुझे
उसका बचपन लौटाया कर

माँ को भी नज़रें लगती हैं
कभी उसकी नज़र उतारा कर

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