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जहाँ न कोई छल था, न कोई कपट-कण।

Dr Preeti

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वसंत की भोर सा एक निष्पाप मन,
        
                                                    
                            
जहाँ न कोई छल था, न कोई कपट-कण।
एक मासूम सा छात्र, अबोध और निष्छल,
जिसकी आँखों में तैरती थी गुरु भक्ति हर पल।
अपनी हर छोटी ख़ुशी उसने दाँव पर लगा दी,
गुरुओं के मान में ही अपनी पूरी दुनिया बसा दी।
क्या अपनी नींद, क्या अपनी खेल-कूद की शाम,
उसका तो हर पल बस शिक्षकों के ही था नाम।
उसने कभी गुरुओं में कोई भेद न माना,
हर शिक्षक को ईश्वर का ही रूप पहचाना।
गणित के गुरु हों या फिर भाषा के आचार्य,
सबकी सेवा में लीन रहना ही था उसका मुख्य कार्य।
न किसी की आज्ञा टाली, न कभी अवहेलना की,
असीम आदर से हर डाँट भी हँसकर पी ली।
जो कह दिया गुरु ने, वही अंतिम सत्य बना,
उसकी हर सोच पर बस गुरु-आशीष ही तन बना।
और जब-जब आता था 'शिक्षक दिवस' का पावन दिन,
उसका निष्पाप ह्रदय धड़कता था बस उसी के बिन।
कोई 'मिशन' हो जैसे, वैसी होती थी तैयारी,
प्रेम और कृतज्ञता की सबसे सुंदर फुलवारी।
न कभी क्लास बंक (skip) करने का कोई विचार आया,
न कभी मन में कोई आलस्य या अंहकार आया।
हाथों से बनाए कार्ड्स में बस एक ही बात छपती थी,
जिसमें गुरु के दिए ज्ञान की पावन ज्योति जगमग करती थी।
उसके लिए 'शिक्षक दिवस' कोई औपचारिकता न थी,
गुरु-चरणों में सर्वस्व अर्पण करने की एक चाहत थी।
क्योंकि उसे पता था—जो भी वह आज बन पाया है,
वह सब उन गुरुजनों की ही अनमोल छाया है।
वह मासूमियत आज भी मिसाल बनकर मुस्कुराती है,
कि निस्वार्थ श्रद्धा ही शिष्य को सच्चा इंसान बनाती है।

 
3 घंटे पहले
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