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राखी पे श्रृद्धांजलि

Dr Preeti

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तीन साल तक तुमने अपना वो दर्द मुझसे छुपाया,
        
                                                    
                            
जब ढल रही थी सांसें, तब बस एक पैगाम आया।
कोरोना का वो खौफ था, नौकरी पर भी तलवार थी,
पर मेरे भाई, तेरे प्रेम के आगे हर बंदिश बेकार थी।

घर में पिता थे थके हुए, पार्किंसन से मजबूर,
मां अवसाद के अंधेरों में, अपनों से बहुत दूर।
तू कोमा में चला गया, सब रिश्तेदार खामोश हुए,
जो कल तक अपने कहते थे, वो सब के सब बेहोश हुए।

कई किलोमीटर की वो दौड़, अस्पताल से घर का फेर,
गाड़ी में अकेले बैठकर, तेरा इंतजार और वो देर।
घंटों राहगीरों को देखना, दवाइयों के लिए भागना,
एक निवाला हलक से न उतरा, रातों को अकेले जगना।

व्हीलचेयर को धकेलते जब उखड़ती थी मेरी सांस,
घट गया था कई किलो वजन, पर सीने में थी एक आस।
खून के लिए हाथ फैलाए, दर-दर ठोकर खाई है,
उस छोटी सी बच्ची की मदद, आज भी याद आई है।

जब तक तेरी सांस चली, कोई संभालने न आया,
मरने के बाद सबने आकर अपना दुख जताया।
एक दिन का वो दिखावा था, फिर छाया सन्नाटा भारी,
साल भर तक कोई न आया, मैं अकेली जंग लड़ती रही सारी।

मां-बाप को संभाला मैंने, उस टूटते घर को बनाया,
नौकर-चाकर व्यवस्थित कर, हर फर्ज अकेले निभाया।
जिसका साथ चाहा था दिल से, वो भी साथ न आया,
सब अपने संघर्ष में थे, मैंने बस यही मन को समझाया।

पर अब इस रक्षाबंधन पर, यह कड़वाहट मेरी सच्चाई है,
तेरे जाने ने मुझे अंदर से तोड़ा, और पत्थर बनाया है।
अब न दिल में कोई मोहब्बत है, न किसी से कोई आस,
मुझसे अब कोई मदद न मांगो, न रखो कोई उम्मीद खास।

जब मेरे तड़पने पर सबने कहा कि सब्र कर लो,
तो अब तुम भी अपने दर्दों में थोड़ा सब्र कर लो।
मुझे माफ करो और मिटा दो अपने जीवन से मेरा नाम,
मैं अपने जहर और कड़वाहट के साथ, करती हूं प्रणाम।
13 घंटे पहले
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