विज्ञापन

प्रोफेसर साहब का 'संत-अवतार'

Dr Preeti

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुर्सी वही, केबिन वही, पर बदला-बदला 'सीन' है,
        
                                                    
                            
कल जिसे तुमने सिखाया, आज वही प्रवीण है! 😜
कल तक जो बातें लगती थीं—"अरे! ये तो बस रूल है,"
आज वही जूनियर बोले, तो लगता सीधा 'शूल' है!

कल तक जिसके 'जी सर' कहने पर तुम भी ताली ठोकते थे,
आज उसी के एक हुक्म पर अंदर ही अंदर घुटते हो!
मैं कहता हूँ—"अरे ओ सीनियर! थोड़ा दिल को थाम लो,
नया-नया है 'हेड' बना, ज़रा ग्रेस से काम लो!"

सीनियर जी को समझ आ गया—"पासा कभी पलटता है,
चाबुक जब जूनियर थामे, तो बड़े ज़ोर से पटकता है!
इसलिए जब पावर में हो, थोड़ी ढील भी दिया करो,
ताकि जब टेबल उल्टी हो, तो घूँट सब्र का पिया करो!"

उधर जूनियर साहब समझे—"बॉस बनना ना आसान है,
ज़िम्मेदारी के चक्कर में, हलक में अटकी जान है!"
दो-चार ग़लतियाँ करेंगे, थोड़ा-बहुत चकराएंगे,
ठोकर खाकर ही तो साहब, असली लीडर कहलाएंगे!

फिर घूमेगा काल का पहिया, एक नया दाँव आएगा,
कल का बॉस भी कुर्सी छोड़, दर्शक बन रह जाएगा!
तब उसको भी समझ पड़ेगा—"अरे रे! खेल पुराना है,
कुर्सी तो बस बहता पानी, कल किसी और का ठिकाना है!"

बेइज्जती का डर जब दिल में थोड़ा-थोड़ा समाएगा,
अहंकार का भूत बेचारा खुद ही भाग जाएगा!
कुर्सी के इस फेर से जब दृष्टि साफ हो जाएगी,
तब जाके 'प्रोफेसर' साहब में 'संत-गिरि' मुस्कुराएगी! 
16 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Vijay BindaasRaja

192 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12711 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10438 कविताएं

View Profile