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माँ-बाप और मैं

Dr Preeti

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रेत की तरह हाथों से फिसलती ज़िंदगी,
        
                                                    
                            
हर मोड़ पर साए की तरह ढलता डर।
बिखरी बहुत, पर कभी हिसाब न मांगा,
ज़ख़्मों से भर गया है रूह का घर।

धुंधले से लगते हैं मंज़िल के रस्ते,
थक कर गुज़रते हैं साए हसीन।
अपनी कज़ा का ख़ौफ़ नहीं इस दिल को,
डर है कि टूटे न अपनों का यक़ीन।

उनका वो प्यार, वो सहलाता साया,
हर मुश्किल में जो बनता था ढांढस।
कहाँ से लाऊँ अल्फ़ाज़ में वो असर,
जो मिटा दे तन्हाई का ये मंज़र।

क्या वो दहलीज़ पर इंतज़ार करते हैं?
अपने जिगर के टुकड़े को याद करते हैं?
कैसे सहेगा वो अकेला ये दर्द,
जब छूट जाएगा अपनों का हाथ।

फ़ोन की घंटी, वो बे-वक़्त की बातें,
हर बात में छिपी वो फ़िक्र की रातें।
सुनती हूँ सब, पर सहम जाती हूँ,
खो न दूँ उन्हें, इस ख़ौफ़ से घबराती हूँ।

कैसा ये ज़माना है, सब पत्थर हो गए,
छिपे हैं अश्क़, सब बे-ख़बर हो गए।
ढूँढती थी निगाहें एक सहारा,
पर मिला हर मोड़ पर तन्हा किनारा।

एक दौर था जब सब्र ही सब कुछ था,
बिना ग़लती के भी माफ़ी का दौर था।
अब हर दिल में रंजिश, हर चेहरे पर गिला,
रिश्तों का नाज़ुक धागा टूट कर मिला।

काश कोई समझे, ये अदाकारी नहीं,
उन के दर्द से तड़पना चालाकी नहीं।
दो क़दम चलने पर उखड़ती हैं सांसें,
हर रात अश्क़ों में डूबती हैं आँखें।

पर इस अंधेरे के पार भी एक चिराग़ है,
ये डर ही तो गवाही है कि दिल पाक है।
जो अपनों के मोम से हौसलों की ढाल बन जाए,
वो टूटकर भी कभी बे-सहारा नहीं होती।

 
एक महीने पहले
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Manju Sharma

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