आदेश मिला है अफ़सर से,
मन कहता है—"कर दो पालन!"
फिर वही मन मन ही मन बोले,
"कर लो थोड़ा-बहुत विलंबन।"
धीमी गति से काम बढ़ाओ,
बातें घुमाओ, वक़्त बिताओ,
रोज़-रोज़ इस कुर्सी पर तुम,
खुद से ही छलावा करते जाओ।
पर ठहरो... पूछो ज़रा दिल से,
यह कैसा 'अपना और पराया'?
जिस रोज़ी से पेट पला है,
उसको भी क्या 'ग़ैर' बताया?
काम तो आखिर अपना ही है,
पर यह सच भी स्वीकार करो,
हर मस्तिष्क की सोच अलग है,
न एक मशीन सा व्यवहार करो!
न कोई एक साँचा ऐसा,
जो हर मन को ढाल सके,
हर मेधा की अपनी तासीर,
न एक ढर्रे पर चाल चले!
उलझन में डूबे मन को तुम,
चाहे कितना भी ज्ञान सिखाओ,
तस्दीक बिना सही दिशा के,
व्यर्थ न अपनी प्रेरणा बहाओ!
ना रोज़-रोज़ आदेश मिले,
ना झूठे संबल की आस रहे,
जो इस पटल पर उतरा है,
उसका स्व-विवेक ही पास रहे!
अगर प्रेरणा खत्म हो चुकी,
और दिल में बस मलाल रहे,
तो त्यागपत्र तुम सौंप के हटो,
ना मन में कोई सवाल रहे!
आदेशों की सीमा से परे,
जब काम ही पहचान बने,
तब दफ़्तर की यह मेज़ तुम्हारी,
साधना का एक स्थान बने!