घुटनों में दर्द है, फिर भी आँखें टंगी हैं द्वार पर,
"कोई तो आए!" सोचे मन, काँपते से हाथ पर।
तिजोरी पर भारी ताला, दिल में बड़ा डर बसा,
'कोई ठग न ले जाए'—सोचकर बंदा खुद ही फँसा!
उम्र ढली, घबराहट बढ़ी, गहरा अकेलापन छा गया,
नौकर ने घूरा ज़रा सा, बीपी हाई हो गया!
सोचते हैं, "कल को जो लाठी भी हाथ से छूट जाएगी,
यह बेरहम दुनिया फिर हमें कितना सताएगी?"
और एक तरफ़ तुम हो, जो कोने में बैठ रोते हो,
परमार्थी बनकर अपनी ही रातों की नींद खोते हो।
जेब खाली है मगर, दिल में हमदर्दी का समंदर है,
'मदद कैसे करूँ?' का एक तूफ़ान उठा अंदर है!
बैंक से लोन लोगे, तो किस्त भला कहाँ से भरोगे?
बुज़ुर्गों से पैसे माँगे, तो खुद ही झेंप मरोगे!
"अरे, नीयत पे मेरी दाग़ न लग जाए कहीं!"
इस डर से बेचारगी में, कोई तरकीब चलती नहीं।
अरे ओ दरियादिल! तुम रोना-धोना अब बंद करो,
बिना पैसों के भी जो हो सके, वो इंतज़ाम करो!
उन्हें धन-दौलत नहीं, बस थोड़ा सा ध्यान चाहिए,
सुनने वाला कान और चेहरे पे मीठी मुस्कान चाहिए।
बैठो कभी पास उनके, उनके ज़माने की बात सुनो,
उलझी हुई दवाइयों में से सही खुराक चुन दो।
मुफ़्त का यह वक़्त दो, न कोई हिसाब होगा,
तुम्हारी निस्वार्थ नीयत पर, कभी न कोई दाग़ होगा!
जादू का न इंतज़ार करो, तुम खुद ही एक चिराग़ बनो,
बिना ख़र्च के जो डर मिटा दे, वो सच्चा दुलार बनो!