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दुर्भाग्य हैं मेरे मुल्क़ का जहाँ कॉकरोच पैदा हो गए

Dr Mahesh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दीमक की तरह जो देश खा रहे
        
                                                    
                            
वो जनता को कॉकरोच कह रहे

अमृत काल में ज़हर विषैला
वो धीरे धोरे दे रहे

प्रचारों में देखो तो देश बड़ा खुशहाल हैं
मॅहगाई की मार से,पर सबका बुरा हाल हैं

बैरोजगारी चरंप पर हैं,न्याय का बुरा हाल हैं
अच्छे दिनों की आस में,देश हो रहा कंगाल हैं

भारत माँ के वीरों को तुम,क्यों काक्रोच कह रहें
संविधान वादी युवा हैं,इसलिए सब सह रहे

अच्छे दिनों की चाह में,कीचड़ बिछ गई देश में
भेडियों का झुण्ड आ गया शेरों के भेष में

सोने की चिड़िया को तुमने,पिंजरे में हैं क़ैद किया
हक मांगने वालों को तुमने जेलों में भेज दिया

दो वक़्त की रोटी की आस में,मॅहगाई से कमर टूट गई हैं
युवाओं को रोज़गार मिलेगा,यह उम्मीदें पीछे छूट गई हैं

नौजवानों को कॉकरोच कहना,यह देश का अपमान हैं
नौजवान देश की शक्ति हैं,यह देश का अभिमान हैं

झूठ की बुनियाद पर,क्यों सत्य को डराते हो
देश की समस्याओं से क्यों ऑंखें चुराते हो

कभी चीन की घुसपैठ,कभी आतंकी हमले
कभी आर्थिक तंगी,कभी चुनावी जुमले

भारत देश की जनता को, तुम कब यूँही सताओगे
अमृत काल में यूँही,कब तक ज़हर पिलाओगे

देश में हर तरफ़ जब गन्दगी ही फैलाओगे
तब यह लाज़मी हैं कि हर तरफ़ कॉकरोच आयेंगे

महल खड़े हैं आज जो झूठ की बुनियाद पर
सच की चलेगी जब आंधी,तब तिनके से उखड़ जायेंगे

जो समझ बैठे हैं खुद को इस देश का ख़ुदा
क्यों उनकी आंखों में कॉकरोच का डर दिखा

दुर्भाग्य हैं मेरे मुल्क़ का जहाँ कॉकरोच पैदा हो गए
गाँधी,सुभाष,भगत सिंह अब ना जाने कहाँ खो गए

-महेश यादव
3 महीने पहले
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