मुक्त होते नहीं अपने आप,
मुक्त होना पड़ता है...
कुछ रिश्तों से नहीं,
उनसे बँधी उम्मीदों से,
कुछ लोगों से नहीं,
उनके बिना जीने के भय से
ख़ुद को मुक्त करना पड़ता है।
संसार तो बाँधता ही रहेगा
मोह की डोर, चाहतों की गाँठों से,
कभी अपनों के नाम पर,
कभी सपनों के नाम पर...
पर मुक्ति कहीं बाहर नहीं,
अपने ही भीतर उतरना पड़ता है,
जो छूट गया, उसे जाने देना,
जो नहीं मिला, उसे भूल जाना,
और जो शेष है, उसे स्वीकार कर
अपने ही मन से मुक्त होना पड़ता है।
क्योंकि मुक्ति का अर्थ
सब कुछ छोड़ देना नहीं,
सब कुछ पास होते हुए भी
किसी का बंधन न होना है...
और एक दिन...
जब अपने भी पराए हो जाएँ,
चाहतें थककर सो जाएँ,
और हाथों में बची रह जाए
सिर्फ़ स्मृतियों की धूल...
तब भीतर से एक आवाज़ आए—
जिसे उम्र भर संसार से माँगते रहे,
वह मुक्ति तो तुम्हारे भीतर थी...
बस, तुम ही
अपने मोह की बेड़ियों को
प्रेम समझकर पहने रहे।
याद रखना—
मुक्ति संसार के छूट जाने में नहीं,
संसार के भीतर रहते हुए
उससे मुक्त हो जाने में है...
और यह मुक्ति कोई देता नहीं,
एक दिन... स्वयं से स्वयं को
मुक्त करना पड़ता है।
-अखिलेश श्रीवास्तव*