मुझे एकांत सर्वथा
से प्रिय है।।
दुनियां की संगत
से हमेशा दूर
रहना ताकि माया।।
की जाल से।।
बचने की रहे।।
सदा से ही मौका।।
पर मिलनसार होना।।
भी एक कला है।।
एकांत में रहना।।
इसे गुरूर कहूं।।
या फिर स्वयं
का कसूर कहूं।।
हां कम से कम
मुझे इतना है सबूर।।
की किसी से कहा
सुनी की न रहेगी फितूर।।
ऐसे एकांतवादी।।
होना और अपनी।।
सोच को अधिक
विकसित करने की।।
है सुरूर।।
मिलनसार होने का
भाव अच्छी आदत है।।
हो सकती है पर
यह कतई समझदारी
की समझ हो यह
नहीं है जरूर।।
एक वक्त तक ही
ये सब है ठहर।।
बिल्कुल अलग थलग
ही रहना जीवन के।।
पाप पुण्य से बचने।।
का एक मात्र है
ठिकान ठोर।।