आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एकांत सर्व प्रिय

                
                                                         
                            मुझे एकांत सर्वथा
                                                                 
                            
से प्रिय है।।
दुनियां की संगत
से हमेशा दूर
रहना ताकि माया।।
की जाल से।।
बचने की रहे।।
सदा से ही मौका।।
पर मिलनसार होना।।
भी एक कला है।।
एकांत में रहना।।
इसे गुरूर कहूं।।
या फिर स्वयं
का कसूर कहूं।।
हां कम से कम
मुझे इतना है सबूर।।
की किसी से कहा
सुनी की न रहेगी फितूर।।
ऐसे एकांतवादी।।
होना और अपनी।।
सोच को अधिक
विकसित करने की।।
है सुरूर।।
मिलनसार होने का
भाव अच्छी आदत है।।
हो सकती है पर
यह कतई समझदारी
की समझ हो यह
नहीं है जरूर।।
एक वक्त तक ही
ये सब है ठहर।।
बिल्कुल अलग थलग
ही रहना जीवन के।।
पाप पुण्य से बचने।।
का एक मात्र है
ठिकान ठोर।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर