विज्ञापन

हम भारत के वीर सिपाही

Diwakar Ojha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम भारत के बीर सिपाही
        
                                                    
                            
रक्षा करना धर्म हमारा ।
हम जगते हैं जग सोता है
ये सारे परिवार हमारा ।।

नहीं है खुद का दुश्मन कोई
अपना धर्म निभाते हैं ।
खुशियाँ देते हैं हम सबको
मंगल दीप जलाते हैं ।।

धर्म नहीं है अपना कोई
सब धर्मो से नाता है ।
हिंदु मुस्लिम सिख इसाई
पर श्रृष्टि एक विधाता है।।

अपनी मनसा एक यही है
फूल खिले हर द्वारों में।
जगमग जगमग दीप जले
पतझड़ के पयसारों में।।

जिसके आँचल की छाया में
पलते हैं बढ़ते हैं सारे ।
ऐसे जगत जननि अवनि से
फल मिलते है न्यारे ।।

हम अरियों का दिल से दुश्मन
यह पहचान हमारा है ।
जहाँ खिले खुशियों की कलियाँ
मधुर बागवाँ प्यारा है ।।

हम में है बलिदानी ताकत
गम में खुशियाँ भरते हैं ।
जिगर है फौलाद का अपना
जिसमें हिन्दुस्तान रखते हैं।।

दिवाकर ओझा"विधुबिहारी" 


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Kumar

4215 कविताएं

View Profile

Rajiv Tyagi

423 कविताएं

View Profile

Sanjay Nirala

42 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12437 कविताएं

View Profile