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"पद्मावती: ज्वाला की रानी"

Divyanshi Gaur

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चमकती थी दीप सी, जलती थी ज्वाला,
        
                                                    
                            
चंद्र सी निर्मल, सिंहनी की आला।
चित्तौड़ की धड़कन, स्वाभिमान की कहानी,
गर्व की मूरत — रानी पद्मावती रानी।

जब घिरा अंधेरा, बरसे दंभ के बादल,
लालच में डूबा था एक क्रूर पागल।
चाहा था कुचलना उस उजाले को,
पर चित्तौड़ की माटी ने जगा दिया ज्वाला को।

रणभूमि सजी थी, गगन भी दहाड़ा,
घोड़ों की टापें, नगाड़ों का निनाद,
तलवारों की टंकार, कवचों की झंकार,
धूल से ढक गया था सूरज का तेज़ प्रकाश।

शेरनी पद्मावती अग्रसर थी आगे,
चमकती थी आँखों में ज्वालामुखी की आग।
ना भय, ना शोक, ना कोई पछतावा,
केवल गर्जना —
"स्वाभिमान पर न झुकूँगी, न हारूँगी!"

पर अकेली न थी वह —
उसके पीछे खड़ी थीं 16,000 रानियाँ,
हर एक ने ओढ़ लिया था मृत्यु का आँचल,
हर हृदय में जल रही थी अस्मिता की मशाल।

चूड़ियाँ खनकती नहीं थीं अब,
वे तलवारों की गूँज में विलीन थीं,
सिर पर अग्नि का मुकुट ,
हाथों में प्रतिज्ञा का दीप था

जौहर की ज्वाला में उठी दिव्य पुकार,
स्वाभिमान ने ओढ़ा अग्नि का हार।
आग बनी चुनरी, राख बना अहंकार,
पद्मावती और सोलह हजार रानियों ने रच दिया अमरत्व का सत्कार।

धधकती लपटों में सजी थी स्वाभिमान की बारात,
रणभूमि में बज रहे थे युद्ध के नगाड़े।
हवाओं ने थामी तलवारें,
धरती भी ललकार उठी —
"जय जय मात भवानी!"

रणभेरी गूँजी, नगाड़े बजे,
घोड़ों की टापों पर थिरका था अभिमान।
जहाँ जली थी अस्मिता की ज्वाला,
वहाँ गूँज उठी एक अमर शौर्य गाथा —
"जय भवानी! जय पद्मावती! जय चित्तौड़ की रानी!"

सर झुकें न झुकें, पर दिल दहल जाए,
जहाँ भी गूँजे —
"जय जय मात भवानी! जय जय मात भवानी!"
एक वर्ष पहले
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