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बचपन की मुस्कान

Divya Kumari

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रोज़ इन नन्हीं–सी मुस्कुराती आँखों को देख
        
                                                    
                            
मेरा अपना बचपन याद आ जाता है।
किसी की कोमल हँसी में,
किसी की भोली–सी सूरत में
वही पुराना बेख़ौफ़ ज़माना लौट आता है—
जब मैं भी खिलखिलाकर हँसा करती थी,
न दुनिया की फ़िक्र,
न कल की कोई बेचैनी।

हाँ… मैं भी कभी उसी मासूम दुनिया में जीती थी।
आज भी जीती हूँ,
पर अब इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी में
वो बचपन वाली निश्छलता
वो बेकल हँसी,
वो भोला–पन कहीं छूट-सा गया है।
बस रह गई है यही कोशिश—
जिंदगी को जैसे-तैसे जीने की दौड़।

इन बच्चों की ये मासूम मुस्कान
दिल को गहराई तक छू जाती है।
इनकी भोली आँखें जैसे कहती हैं—
“तुम भी कभी हमारे जैसे ही थे,
उतने ही निर्मल, उतने ही उत्सुक,
उतने ही नादान…”

और शायद सच है—
कहते हैं, जिसका बचपन अच्छा हो,
उसका दिल उम्र भर मुलायम रहता है।
मैं खुद को खुशकिस्मत मानती हूँ
कि मेरा बचपन इतना सुंदर था,
इतना स्नेह, इतनी हँसी, इतनी रोशनी से भरा हुआ।

इन नन्हे चेहरों की मुस्कान
मुझसे फुसफुसाकर कहती है—
"अपने भीतर के बच्चे को मत खोने देना…
उसे जगा कर रखना…
उसे सहेज कर रखना…
उसे कभी मरने मत देना।"
8 महीने पहले
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