वह हांड़-मांस का बना शख्स
तूफानों से टकराता था,
वह सत्य अहिंसा का पुजारी
सदैव सादा जीवन जीता था।
सत्य, अहिंसा और प्रेम का पाठ
जग को उसने पढ़ाया था,
अहिंसा से बड़ा कोई धर्म नहीं
जन-जन को यह सिखलाया था।
आज भी गांधी का विचार
जन-गण-मन में बसता है,
कैसे कोई सिरफिरा नाथूराम
उस गांधी को ख़त्म कर सकता है?
दिनेश यादव
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।