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ग़ज़ल

Dinesh Soni

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            छुपना और छुपाना छोड़
        
                                                    
                            
चल! अब तू शरमाना छोड़

उन यादों से बाहर आ
उनमें गोते खाना छोड़

छोड़ गया वो, ग़म कैसा
तू भी ठ़ौर-ठ़िकाना छोड़

बाँध परिंदा ऐसे कुछ
धरती पर ले दाना छोड़

"मंज़र" इतनी दूर निकल
झूठा जग का बाना छोड़


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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