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झूठ की दुकान में बेईमान चंगा रहा

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक हैंगर की तरह हर आदमी टँगा रहा
        
                                                    
                            
कभी कपड़ों से सजा तो कभी नंगा रहा.

लोग खुशियाँ होंठ पर रख रोज हँसते रहे
दिल मगर रोता रहा और पेट से पंगा रहा .

गिरगिटों के शहर में मगरमच्छ भी मिले
झूठ की दुकान में हर बेईमान चंगा रहा.

बेंच कर भगवान को शान से रहते मिले
थे पुजारी शान्ति के पर संग में दंगा रहा.

हम तिलस्मी देश के नागरिक क्या बनें
एक लंगोटी साथ है बाकी बदन नंगा रहा.
-दिनेश चौहान
6 घंटे पहले
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