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झूठ की दुकान में बेईमान चंगा रहा

dinesh chauhan

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                            एक हैंगर की तरह हर आदमी टँगा रहा
        
                                                    
                            
कभी कपड़ों से सजा तो कभी नंगा रहा.

लोग खुशियाँ होंठ पर रख रोज हँसते रहे
दिल मगर रोता रहा और पेट से पंगा रहा .

गिरगिटों के शहर में मगरमच्छ भी मिले
झूठ की दुकान में हर बेईमान चंगा रहा.

बेंच कर भगवान को शान से रहते मिले
थे पुजारी शान्ति के पर संग में दंगा रहा.

हम तिलस्मी देश के नागरिक क्या बनें
एक लंगोटी साथ है बाकी बदन नंगा रहा.
-दिनेश चौहान
एक महीने पहले
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