खुशियाँ हजार मिलीं
ग़म की हरदम चली.
कभी खुशी कभी ग़म
जिंदगी रही ये बेदम .
होंठ हँसते ही रहे
ग़मों को पीते रहे .
जुबां कैंची सी चली
बात रिश्तों की टली.
चादर प्रेम की ओढ़ी
निभाई दुश्मनी ड्योढी.
दिनेश चौहान