विज्ञापन

हवाएँ आवारगी करने लगीं

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तोड़ अपने लाज के अनुबन्ध को
        
                                                    
                            
फिर हवाएँ आवारगी करने लगीं
तोड़कर तटबंध सारे मानकों के
आँचलो को छेड़ कर चलने लगीं .

गगन को एकाकी छोड़ कर सब
धरा की ओर मुड़ नित बढ़ती रहीं
बदलियों से साजिशें कर के बढ़ी
दिशाएँ प्रतिपल खुद बदलने लगीं .

शिखर पर्वत का छूकर जब चली
दूरियाँ हरदम धरा से बढ़ती दिखीं
धरा से झुक कर जब मिलने चली
गति अपनी ही ठहरती दिखने लगी.

नदी के दोनों कूल सा मिलना कहाँ
एक से मिलना दूसरे का छूटा जहां
मिलन सुख दुःख सा बिछड़ना भी
जिन्दगी हवाओं सी बस चलने लगी.
-दिनेश चौहान
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all