डोर रिश्तों की जब भी टूट गई
इक नई गांठ उसमें भी लग गई.
जब कोई गांठ रिश्तों में लगती
नजदीकियों पे नजर लग गई .
डोर छोटी होती गांठ लगने पर
दूरियां हर गांठ पर तो बढ़ गई.
बहुत नाजुक होते हैं सभी बंधन
टूटते हैं , जरा सी आँख लग गई.
सहेज कर दिलों में जब भी रखो
जरा सी बात जरूर हमें लग गई.
-दिनेश चौहान