शिखर हिमालय का रोया तो नदियों में सैलाब बना
वृक्ष धरा पर गिरे सभी तो सड़कों पर रेगिस्तान बना.
हवा पश्चिमी बही देश में टूटे परिजन संग सब रिश्ते
रहते थे जिस घर में मिलकर वही आज श्मशान बना.
हमने बोये बीज शान्ति के उग आये कांटों के जंगल
जब जब कदम बढ़ाये हमने पथ ये लहूलुहान बना.
मित्र मित्रता भूल गए सब संघर्षों की तलवार चलीं
युद्ध क्षेत्र बस्ती में उपजे हर एक मन बियाबान बना.
हृदय मर चुके सब लोगों के धन की एक पुकार उठी
जंगल जंगल बस्ती बस्ती चोरों का हिन्दुस्तान बना.
-दिनेश चौहान