विज्ञापन

छोड़ अयोध्या बाहर आयें

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            युग दसकंधर चहुं दिश अंधर
        
                                                    
                            
जन जन व्याकुल सुप्त दिशायें
लक्ष्य किधर यात्रायें सब भटकी
मर्यादा पुरुषोत्तम चलकर आयें .

पूज रहे अभिशप्त शिला अब
नर नारी विध्वंसक हुए सब
प्रकृति देख ये लाचार हो रही
अब पुरुषोत्तम धनुष उठायें .

त्याग आवरण आदि हो गये
अंतस की सब व्याधि हो गये
अंग विकारों में रत दिखते
अब प्रत्यंचा श्री राम चढ़ायें .

पनघट पनघट मेघनाथ हैं
असुरों का ही शंखनाद है
चरम भक्ति का आर्तनाद है
छोड़ अयोध्या बाहर आयें.

खुद पुरुषोत्तम धनुष उठाये
मर्यादा रख चल कर आयें
अब प्रत्यंचा श्री राम चढ़ायें
छोड़ अयोध्या बाहर आयें.
-दिनेश चौहान
4 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Rajan

30 कविताएं

View Profile