युग दसकंधर चहुं दिश अंधर
जन जन व्याकुल सुप्त दिशायें
लक्ष्य किधर यात्रायें सब भटकी
मर्यादा पुरुषोत्तम चलकर आयें .
पूज रहे अभिशप्त शिला अब
नर नारी विध्वंसक हुए सब
प्रकृति देख ये लाचार हो रही
अब पुरुषोत्तम धनुष उठायें .
त्याग आवरण आदि हो गये
अंतस की सब व्याधि हो गये
अंग विकारों में रत दिखते
अब प्रत्यंचा श्री राम चढ़ायें .
पनघट पनघट मेघनाथ हैं
असुरों का ही शंखनाद है
चरम भक्ति का आर्तनाद है
छोड़ अयोध्या बाहर आयें.
खुद पुरुषोत्तम धनुष उठाये
मर्यादा रख चल कर आयें
अब प्रत्यंचा श्री राम चढ़ायें
छोड़ अयोध्या बाहर आयें.
-दिनेश चौहान
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