आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

छोड़ अयोध्या बाहर आयें

                
                                                         
                            युग दसकंधर चहुं दिश अंधर
                                                                 
                            
जन जन व्याकुल सुप्त दिशायें
लक्ष्य किधर यात्रायें सब भटकी
मर्यादा पुरुषोत्तम चलकर आयें .

पूज रहे अभिशप्त शिला अब
नर नारी विध्वंसक हुए सब
प्रकृति देख ये लाचार हो रही
अब पुरुषोत्तम धनुष उठायें .

त्याग आवरण आदि हो गये
अंतस की सब व्याधि हो गये
अंग विकारों में रत दिखते
अब प्रत्यंचा श्री राम चढ़ायें .

पनघट पनघट मेघनाथ हैं
असुरों का ही शंखनाद है
चरम भक्ति का आर्तनाद है
छोड़ अयोध्या बाहर आयें.

खुद पुरुषोत्तम धनुष उठाये
मर्यादा रख चल कर आयें
अब प्रत्यंचा श्री राम चढ़ायें
छोड़ अयोध्या बाहर आयें.
-दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर