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चाह सागर की

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक नदी की तरह बहना होता है प्रेमिका को
        
                                                    
                            
सब कुछ समर्पित करना होता है पवित्र प्रेम को
घाटों की तरह सफर में लोग मिलते हैं उसको
सबको देखकर चुपचाप चलना होता है आगे को.

लहरें उठती हैं बार बार गिरती हैं हर बार नीचे
यात्रा में अपनी कब देखती है नदी अपने पीछे.
बहती है शांति से कभी उछलती है परिश्रांत हो
मिलन की चाह लिए हृदय हजारों उसने सींचे.

विलय की कामनाएँ विजय पथ प्रशस्त करतीं
मिलन की भावनाएं प्रति पल को व्यस्त रखती
प्रेम का अनुबन्ध ये समय सीमा से कब बँधा है
सफ़र लम्बा चाह सागर की मन को मस्त रखती.
-दिनेश चौहान
12 घंटे पहले
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