एक नदी की तरह बहना होता है प्रेमिका को
सब कुछ समर्पित करना होता है पवित्र प्रेम को
घाटों की तरह सफर में लोग मिलते हैं उसको
सबको देखकर चुपचाप चलना होता है आगे को.
लहरें उठती हैं बार बार गिरती हैं हर बार नीचे
यात्रा में अपनी कब देखती है नदी अपने पीछे.
बहती है शांति से कभी उछलती है परिश्रांत हो
मिलन की चाह लिए हृदय हजारों उसने सींचे.
विलय की कामनाएँ विजय पथ प्रशस्त करतीं
मिलन की भावनाएं प्रति पल को व्यस्त रखती
प्रेम का अनुबन्ध ये समय सीमा से कब बँधा है
सफ़र लम्बा चाह सागर की मन को मस्त रखती.
-दिनेश चौहान