आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चाह सागर की

                
                                                         
                            एक नदी की तरह बहना होता है प्रेमिका को
                                                                 
                            
सब कुछ समर्पित करना होता है पवित्र प्रेम को
घाटों की तरह सफर में लोग मिलते हैं उसको
सबको देखकर चुपचाप चलना होता है आगे को.

लहरें उठती हैं बार बार गिरती हैं हर बार नीचे
यात्रा में अपनी कब देखती है नदी अपने पीछे.
बहती है शांति से कभी उछलती है परिश्रांत हो
मिलन की चाह लिए हृदय हजारों उसने सींचे.

विलय की कामनाएँ विजय पथ प्रशस्त करतीं
मिलन की भावनाएं प्रति पल को व्यस्त रखती
प्रेम का अनुबन्ध ये समय सीमा से कब बँधा है
सफ़र लम्बा चाह सागर की मन को मस्त रखती.
-दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
9 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर