अंतस की मंथरा ने जब आँखों से खुशियाँ देखी
रहा न गया उससे उसने विध्वंस की नीति खोजी.
मैल मन का उभर ऊपर आया फिर उबाल आया
कैकयी की खोज में निकली किसी को समझाया.
खुशियाँ जहां बरसती थीं वहां द्वेष का बीज बोया
राजपाट उस घर का तोड़ा और दशरथ को खोया.
युक्ति परवान चढ़ी खुशहाल अयोध्या विध्वंस हुई
मंथरा हजारों हैं, टूटते परिवार बात आज सत्य हुई.
-दिनेश चौहान