हिंदी- भारत की आत्मध्वनि
हिंदी केवल शब्द नहीं,
भारत की पहचान है,
माटी की सौंधी खुशबू है,
जन-जन की मुस्कान है।
मन के भावों को स्वर देती,
संबंधों में प्राण भरे,
भारत की आत्मा से निकली
मधुर सरल यह तान है।
हिंदी भारत की आत्मध्वनि,
हिंदी भारत का मान है।
संस्कृत की पावन धारा से
पोषित जिसका रूप हुआ,
लोक-वाणी के विविध रंग से
जिसका सुंदर स्वरूप हुआ।
गाँव-गली से नगर-नगर तक,
घर-आँगन से विश्व तलक,
जनजीवन की सहज चेतना
बनकर इसका विस्तार हुआ।
हिंदी भारत की आत्मध्वनि,
हिंदी भारत का मान है।
माँ की ममता इसमें बोले,
पिता का अनुशासन झलके,
दादी के किस्सों में गूँजे,
बचपन इसके संग-संग पलके।
प्रेम-पत्र की कोमल भाषा,
वीर हृदय का घोष बने,
दुःख में आँसू पोंछे चुपके,
सुख में मंगल-गीत छलके।
हिंदी भारत की आत्मध्वनि,
हिंदी भारत का मान है।
कबीर की निर्भीक वाणी में,
तुलसी के विश्वास में,
सूरदास के प्रेम-सरोवर,
मीरा के मधुमास में।
भारतेंदु की जागृति बनकर,
प्रेमचंद के यथार्थ में,
दिनकर के ओजस्वी स्वर में,
गूँजे यह इतिहास में।
हिंदी भारत की आत्मध्वनि,
हिंदी भारत का मान है।
यह केवल अतीत की भाषा
नहीं, भविष्य की शक्ति है,
ज्ञान-विज्ञान, शोध-विचारों की
नवयुगीन अभिव्यक्ति है।
तकनीकी संसार में भी
नव शब्दों को रूप दे,
डिजिटल युग के द्वार खोलती
यह सृजनशील युक्ति है।
हिंदी भारत की आत्मध्वनि,
हिंदी भारत का मान है।
भाषाएँ भारत की बगिया हैं,
हिंदी उसका एक सुमन,
तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम,
बंगला, पंजाबी, असमिया मन।
मराठी, गुजराती, उड़िया,
काश्मीरी, मैथिली संग,
सबकी अपनी सुगंध निराली—
सबसे सुंदर भारत-उपवन।
हिंदी भारत की आत्मध्वनि,
हिंदी भारत का मान है।
हिंदी में संवाद बढ़े तो
दूर रहें मन के अंतर,
शब्द बनें संवेदना के,
मिटें विभाजन के पत्थर।
जाति-प्रांत की सीमाओं से
ऊपर उठकर प्रेम जगे,
एक-दूसरे को समझ सकें जब,
मजबूत बने भारत-अंतर।
हिंदी भारत की आत्मध्वनि,
हिंदी भारत का मान है।
विश्व-पटल पर हिंदी पहुँचे,
साथ लिए संस्कृति का दीप,
ज्ञान-विचारों की गंगा बन
बहती जाए अविरल, अतीव।
जहाँ कहीं भारत का मन है,
वहाँ सुनाई दे इसकी धुन,
विश्व-बंधुत्व का संदेश सुनाती
बने प्रेम का मधुर प्रतीक।
हिंदी भारत की आत्मध्वनि,
हिंदी भारत का मान है।
आओ हिंदी को अपनाएँ,
केवल उत्सव के दिन नहीं,
बोलचाल, व्यवहार, सृजन में
रहे निरंतर कम न कहीं।
अपने शब्दों पर गर्व करें हम,
अन्य भाषाओं का मान करें,
भाषा बने जोड़ने वाली-
दीवारों का साधन नहीं।
हिंदी भारत की आत्मध्वनि,
हिंदी भारत का मान है।
शब्द हमारे दीप बनें और
वाणी बने उजियार,
हिंदी में हो सत्य-विचार और
हिंदी में हो सत्कार।
नव पीढ़ी के हाथों में देकर
ज्ञान-सृजन की लेखनी,
जन-जन के हृदयों में फिर से
जगमग हो इसका संसार।
हिंदी केवल भाषा नहीं,
'द्विज' यह संवेदना का गान है;
हिंदी भारत की आत्मध्वनि,
हिंदी भारत का मान है।