देखो, मुद्दा है तो फिर मुद्दा बनाओ,
नहीं है कुछ तो माहौल न बनाओ।
माना कि करनी है तुम्हें राजनीति,
लेकिन यूं न सबको तुम पागल बनाओ।
EVM पर सवाल उठाओ, ठीक है, जांच कराओ,
SIR में जो मर गए, उन्हें जीवित कर फिर लाओ।
ठीक है, तुम्हारे पास हैं ECI के खिलाफ सबूत
ज़रा एक बार सबूतों को महफ़िल में लेकर आओ।
EVM में झोल है तो बैलेट में झोल नहीं होगा?
इसमें सेटिंग संभव है तो उसमें बवंडर नहीं होगा?
चलो, मान लिया कि तुम ही सही, बाकी गलत हैं,
लेकिन महाराज, ये तो बताओ-ठोस सबूत किधर हैं?
माना कि सब गलत हैं, तो तुम कोर्ट क्यों नहीं गए?
हर बार तो जाते हो, इस बार क्यों थथम गए?
क्या सबूतों में दम नहीं है या फिर सबूत ही नहीं हैं?
सुनो, इस बार फुस्स हुए तो तुम्हारी कहानी खत्म है!
कहते हो कि जनता की अदालत में ही हिसाब होगा,
दिल्ली में जो हुआ, कितनों का नुकसान हुआ होगा?
कथित ‘लोकतंत्र बचाने’ में जनता को ही पीस दिए?
हर बार न जाने कितने नेता कितने जूते तुमने घिस दिए!
जनता के नाम पर आखिर कब तक ये खेल होगा?
सत्ता मिले तो जनादेश, हार मिले तो क्लेश होगा?
वोट जनता का है, तो फैसला भी जनता का मानो
हार का ठीकरा सिस्टम पर अब नहीं फोड़ना होगा!
लोकतंत्र बचाने निकले हो, पहले अपना हिसाब दो
जहां जीते, वहां चुप क्यों थे? इसका भी जवाब दो।
कभी EVM, कभी SIR...हर हार का नया बहाना
सबूत लेकर मैदान में आओ, बंद करो ये अफसाना!
सवाल उठाना हक़ है, मगर सवालों का जवाब भी दो
जनता को जो मुद्दे चाहिए, उनका भी तो हिसाब दो।
तुम्हें चाहिए SIR का ख़ात्मा और ज्ञानेश का इस्तीफ़ा,
जनता को महंगाई से राहत चाहिए, उस पर भी जवाब दो!
टंकी से पेट्रोल गायब है और किचन से मीठी चीनी
ठंड से नहीं, महंगाई से बदन में है कनकनी।
सच है कि तुम लोग अपनी जनता को भांप ही नहीं पाए
चाहते हो कि चलती रहे तुम्हारी अपनी मनमानी!
अंत में फिर यही कहूंगा- मुद्दा है तो मुद्दा बनाओ,
अगर नहीं है तो शांत बैठो, अब माहौल न बनाओ!