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अगर जो नदियाँ चाहतीं

Dhriti Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अगर जो नदियाँ चाहतीं,
        
                                                    
                            
मिला देतीं नदियाँ
कश्तियों को किनारों से।

जो अगर चाहती होतीं,
तो मिट जाते सारे ग़म,
जो अगर मिल जातीं
तो...

ये बादल,
ये हवाएँ—
सब चाहते थे।

ये किनारे
ख़ुद आए थे
मदद माँगने को।

पर तुमने सुना कहाँ...

सच,
अगर नदियाँ चाहतीं,
तो कश्तियाँ
कभी किनारों से दूर न होतीं।
2 महीने पहले
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