आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अगर जो नदियाँ चाहतीं

                
                                                         
                            अगर जो नदियाँ चाहतीं,
                                                                 
                            
मिला देतीं नदियाँ
कश्तियों को किनारों से।

जो अगर चाहती होतीं,
तो मिट जाते सारे ग़म,
जो अगर मिल जातीं
तो...

ये बादल,
ये हवाएँ—
सब चाहते थे।

ये किनारे
ख़ुद आए थे
मदद माँगने को।

पर तुमने सुना कहाँ...

सच,
अगर नदियाँ चाहतीं,
तो कश्तियाँ
कभी किनारों से दूर न होतीं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर