विज्ञापन

गांव को गांव ही रहने दो

Devendra Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गांव को गांव ही रहने दो
        
                                                    
                            

हिमालय की गोद में बसे गाँव,
इन्हें गाँव ही रहने दो,
शहरी सुविधाओं की चाह में
इन्हें शहर न बनाओ।

दीवार से दीवार मिले घर,
एक आँगन रहने दो,
मेरा-तेरा के भेद की दीवारें
भाई-भाई के बीच न उठाओ।

एक घर की बेटी-बहू,
पूरे गाँव की बेटी-बहू,
यह सुहानी रीत चलने दो,
नज़रों में भेद न लाओ।

पुरखों के खून-पसीने से सींची है
खेत-खलिहानों की माटी,
इन्हें बेचकर गैरों की आरामगाहें
इन पर न बनवाओ।

अपनों के लिए द्वार कभी न हों बंद,
गैरों के लिए न रहें हमेशा खुले,
बड़े-बुज़ुर्गों की यह सीख
कभी न बिसराओ।

विकास की चाह रखो,
मूलभूत सुविधाओं की माँग करो,
पर अपनी पहचान मिटाकर
पर्यटन नगरी बनने के-
स्वप्न न संजोओ।
 
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all