गांव को गांव ही रहने दो
हिमालय की गोद में बसे गाँव,
इन्हें गाँव ही रहने दो,
शहरी सुविधाओं की चाह में
इन्हें शहर न बनाओ।
दीवार से दीवार मिले घर,
एक आँगन रहने दो,
मेरा-तेरा के भेद की दीवारें
भाई-भाई के बीच न उठाओ।
एक घर की बेटी-बहू,
पूरे गाँव की बेटी-बहू,
यह सुहानी रीत चलने दो,
नज़रों में भेद न लाओ।
पुरखों के खून-पसीने से सींची है
खेत-खलिहानों की माटी,
इन्हें बेचकर गैरों की आरामगाहें
इन पर न बनवाओ।
अपनों के लिए द्वार कभी न हों बंद,
गैरों के लिए न रहें हमेशा खुले,
बड़े-बुज़ुर्गों की यह सीख
कभी न बिसराओ।
विकास की चाह रखो,
मूलभूत सुविधाओं की माँग करो,
पर अपनी पहचान मिटाकर
पर्यटन नगरी बनने के-
स्वप्न न संजोओ।
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