नज़र में घूमते हैं भूले-बिसरे वादे रह-रह कर,
कहाँ तक कोई भागे अपने ही साए से डर-डर कर।
वो सारे ख़्वाब जो हम दोनों ने मिलकर बुने थे कभी,
बिखरते जा रहे हैं रेत की मानिंद अब झर-झर।
सफ़र उल्फ़त की राहों का बड़ा ही सख़्त है लेकिन,
कटी है उम्र अपनी मुश्किलों से ही गुज़र-गुज़र।
सँभलना अब बहुत मुश्किल है इस तूफ़ान में दिल के,
कि कश्ती आ फँसी है दर्द के गहरे समंदर पर।
तबाही का सबब उल्फ़त की राहों में न पूछो अब,
कि 'देव' आया है इस महफ़िल में अपना सब गँवा कर पर।
-देवेन्द्र पंत