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कहाँ तक कोई भागे

                
                                                         
                            नज़र में घूमते हैं भूले-बिसरे वादे रह-रह कर,
                                                                 
                            
कहाँ तक कोई भागे अपने ही साए से डर-डर कर।

वो सारे ख़्वाब जो हम दोनों ने मिलकर बुने थे कभी,
बिखरते जा रहे हैं रेत की मानिंद अब झर-झर।

सफ़र उल्फ़त की राहों का बड़ा ही सख़्त है लेकिन,
कटी है उम्र अपनी मुश्किलों से ही गुज़र-गुज़र।

सँभलना अब बहुत मुश्किल है इस तूफ़ान में दिल के,
कि कश्ती आ फँसी है दर्द के गहरे समंदर पर।

तबाही का सबब उल्फ़त की राहों में न पूछो अब,
कि 'देव' आया है इस महफ़िल में अपना सब गँवा कर पर।
-देवेन्द्र पंत
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3 महीने पहले

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