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आज की विजयादशमी

Devendra Mani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर साल सजाते हैं मेला, हर साल जलाते रावण का पुतला ।
        
                                                    
                            
पर इस युग मे क्या,
मन भी सचमुच है उजला ?
हम फूंक रहे कागज का रावण, चौराहों पर चिल्ला- चिल्ला कर।
पर असली रावण बैठा है, खुद हमारे भीतर छुपकर।
वह त्रेता का रावण था, जो मर्यादा से हारा था,
पर आज समय बदला देखो, हर ओर हिंसा भारी है।
भ्रष्टाचार, स्वार्थ और नफरत की, फैली यही बीमारी है।
अब रावण किसी एक रूप में, लंका में नहीं समाता है,
वह कहीं भ्रष्टाचार के दानव में, तो कहीं नारी के अपमान में है।
कहीं भाई-भाई की जंग में है, तो कहीं टूटे हुए इंसान में है।
हम हाथ में लेकर स्मार्टफोन, अच्छाई का ढोंग रचाते हैं।
स्टेटस पर तो हैं राम बने, पर भीतर रावण पालते हैं।
सिर्फ पुतले जलते रहने से, यह पर्व नहीं साकार होगा,
जब तक न बदलेंगे हम खुद को, तब तक जीवन साकार न होगा।
आओ इस बार दशहरा पर, एक सच्चा संकल्प करें हम।
बाहर के पुतले के साथ-साथ, भीतर के मैल जलाएं हम।
जब लालच, हिंसा, ईर्ष्या का, इस मन से अंत हो जाएगा।
उस दिन हर दिल में राम बसेंगे, और सच्चा विजयदशमी पर्व कहलाएगा।
-देवेंद्र मणि पाण्डेय
एक घंटा पहले
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