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भ्रम के उस पार

Devanshi gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुमने क्या कहा...?
        
                                                    
                            
सुनो...
क्या अब भी
भ्रम में जी रहे हो,
या कल्पनाओं को
हक़ीक़त मान बैठे हो?
मुझे पता है...
वक़्त की आग
तुम्हें भी तपाएगी।
सिक्के के तो
दो ही चेहरे होते हैं,
मगर इंसानों के...
अनगिनत।
मैं तब लिखती हूँ,
जब डर
मेरे भीतर बोलता है।
काश...
तुम मेरी आँखों से
दुनिया देख पाते,
मैंने उम्मीदों को
जलते देखा है।
सुकून मेरा चुनाव है,
मगर सफ़र
रेगिस्तानों का है,
और सपने
अब भी आसमान के।
मज़बूत बनो...
क्योंकि यहाँ
सहारा कम,
इम्तिहान ज़्यादा मिलते हैं।
मैं लेखिका नहीं...
बस ज़िंदगी को
गहराई से महसूस करती हूँ।
खुद को फिर से जगा लो...
क्योंकि हर लड़ाई
ख़ुद ही लड़नी पड़ती है।
और सुनो...
उस अथाह अँधेरे में
मत उतरना।
मेरे शब्द याद रखना...
ये बददुआ नहीं,
ज़िंदगी का सबक़ हैं।
2 महीने पहले
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